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संपादकीय

संपादकीय श्रेणी समसामयिक मुद्दों पर गहन विचार, विश्लेषण और विवेकपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। यहाँ घटनाओं को तथ्यों, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी के आधार पर परखा जाता है।

जनविवेक संपादकीय के माध्यम से पाठकों को सोचने, प्रश्न करने और लोकतांत्रिक चेतना को मजबूत करने का प्रयास करता है।

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संविधान और नागरिक जागरूकता

संविधान और नागरिक जागरूकता: लोकतंत्र की असली ताक़त

भूमिका हर बार जब हम अपना गणतंत्र दिवस मनाते हैं, तब हमारे मन में यह विचार अवश्य आना चाहिए किदेश के प्रति एक नागरिक होने के नाते मेरी क्या ज़िम्मेदारी है।क्या हम सच में अपने नागरिक कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन कर रहे हैं? एक जागरूक नागरिक बनना ही इन सभी सवालों का सबसे सही […]

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Janvivek क्यों – विवेक, जागरूकता और नागरिक आवाज़ का मंच

Janvivek क्यों – विवेक, जागरूकता और नागरिक आवाज़ का मंच

प्रस्तावना: लोकतंत्र में सबसे बड़ी कमी Janvivek क्यों – विवेक, जागरूकता और नागरिक आवाज़ का मंच – भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन यह भी उतना ही कड़वा सत्य है कि यहाँ लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होती जा रही है। आज नागरिक अधिकारों की बात तो करते हैं, लेकिन नागरिक कर्तव्यों की समझ

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अरावली to अवतार: मानवीय स्वभाव, संसाधन-लालसा और भविष्य की चेतावनी

प्रस्तावना “अरावली to अवतार” – जब किसी समाज के सामने एक ही समय में दो अलग-अलग घटनाएँ घटती हैं, लेकिन दोनों का मूल स्वभाव एक-सा दिखाई देता है, तब वह केवल संयोग नहीं रह जाता, बल्कि चेतावनी बन जाता है। आज भारत में अरावली पर्वतमाला के साथ जो हो रहा है और वैश्विक स्तर पर

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kya ham sab bharatiya hai

(क्या) हम सब भारतीय हैं?

संविधान, समाज और वर्तमान समय के संदर्भ में एक आत्ममंथन प्रस्तावना आज के समय में “क्या हम सब भारतीय हैं?” यह प्रश्न पूछना केवल एक भावनात्मक सवाल नहीं रह गया है, बल्कि यह एक गंभीर सामाजिक, संवैधानिक और राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन चुका है। यह सवाल इसलिए और अधिक प्रासंगिक हो जाता है क्योंकि

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जनविवेक

जनविवेक : समाज की सोच और कार्य की सामूहिक ज़िम्मेदारी

जनविवेक : समाज की सोच और कार्य की सामूहिक ज़िम्मेदारी (Janvivek – The Collective Conscience of Society) जनविवेक क्या है? जन का अर्थ है — लोग, जनता, आम नागरिक। समाज में रहने वाले, रोज़मर्रा के संघर्षों से जूझने वाले, सुख-दुख को महसूस करने वाले सामान्य लोग ही जन कहलाते हैं। हम जिन चेहरों को रोज़

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उत्क्रांति

उत्क्रांति एक सतत विकासात्मक प्रवाहित प्रक्रिया। सृष्टि का सत्य और परिवर्तन का कभी न ख़त्म होने वाला निरंतर चक्र ही उत्क्रांति है। उत्क्रांति  की इस प्रक्रिया में सार्वभौमिक कानून स्थापित होते हैं और यहां तक ​​कि स्थापित सिद्धांत भी इस प्रक्रिया से नष्ट हो जाते हैं। उत्क्रांति न केवल जीवन की एक प्राकृतिक प्रक्रिया है,

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