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अरावली पर्वत माला पर संकट: भौगोलिक स्थिति, सुप्रीम कोर्ट और वर्तमान स्थिति का विश्लेषण

अरावली पर्वत माला पर संकट

प्रस्तावना (पृष्ठभूमि)

अरावली पर्वत माला पर संकट : भारत की प्राकृतिक विरासत में अरावली पर्वतमाला का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह केवल पहाड़ों की एक श्रृंखला नहीं, बल्कि उत्तर भारत के पर्यावरणीय संतुलन की रीढ़ है। हाल के वर्षों में अरावली पर्वतमाला से जुड़े न्यायिक निर्णय, पर्यावरणीय विवाद और राजनीतिक बहस लगातार सुर्खियों में रहे हैं।
खनन, शहरीकरण और प्रशासनिक निर्णयों के कारण अरावली आज गंभीर संकट का सामना कर रही है। यह लेख अरावली पर्वतमाला की भौगोलिक स्थिति, उसका महत्व, सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति, उनके निर्णय, अरावली की परिभाषा, विरोध के कारण और वर्तमान स्थिति का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

अरावली पर्वतमाला की भौगोलिक स्थिति

अरावली पर्वतमाला भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। इसका विस्तार लगभग 800 किलोमीटर तक है।

प्रमुख भौगोलिक स्थिति तथ्य:

  • अरावली पर्वतमाला गुजरात के पालनपुर से शुरू होकर
  • राजस्थान, हरियाणा और
  • दिल्ली (एनसीआर क्षेत्र) तक फैली हुई है
  • इसकी सबसे ऊँची चोटी गुरु शिखर (माउंट आबू) है

यह पर्वतमाला थार मरुस्थल और उपजाऊ मैदानों के बीच एक प्राकृतिक अवरोध का काम करती है।

अरावली पर्वतमाला का भौगोलिक स्थिति एवं पर्यावरणीय महत्व

अरावली केवल भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र है।

अरावली का पर्यावरणीय महत्व:

  • मरुस्थलीकरण रोकने में सहायक
  • भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) में महत्वपूर्ण भूमिका
  • दिल्ली-NCR की वायु गुणवत्ता को संतुलित करती है
  • अनेक वन्यजीवों और वनस्पतियों का प्राकृतिक आवास
  • मानसून की हवाओं को नियंत्रित कर वर्षा प्रणाली में योगदान

यदि अरावली कमजोर होती है, तो उसका सीधा प्रभाव दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान के पर्यावरण पर पड़ता है।

अरावली पर्वतमाला पर सुप्रीम कोर्ट की समिति

(Supreme Court Committee on Aravalli Hills)

सुप्रीम कोर्ट की समिति का गठन कब हुआ?

मई 2024 में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वतमाला से जुड़े एक महत्वपूर्ण विवाद को सुलझाने के लिए एक उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया।

इस समिति के गठन का मुख्य कारण यह था कि
राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात जैसे राज्यों में “अरावली पर्वत” की परिभाषा अलग-अलग थी।
इसी भ्रम के कारण:

  • पर्यावरण संरक्षण के कानूनों का समान रूप से पालन नहीं हो पा रहा था
  • खनन (माइनिंग) और निर्माण गतिविधियों पर रोक को लेकर विरोधाभास था

सुप्रीम कोर्ट की समिति का उद्देश्य क्या था?

सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित इस समिति को मुख्य रूप से निम्नलिखित जिम्मेदारियाँ दी गई थीं:

  • अरावली पर्वतमाला की एक समान और वैज्ञानिक परिभाषा तय करना
  • यह स्पष्ट करना कि किन भू-भागों को अरावली माना जाए
  • पर्यावरण संरक्षण और खनन नियंत्रण के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश देना
  • केंद्र और राज्यों के बीच चल रहे कानूनी टकराव को समाप्त करना

समिति की रिपोर्ट कब आई?

इस विशेषज्ञ समिति ने अपना अध्ययन पूरा करने के बाद
अक्टूबर 2025 में अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट और पर्यावरण मंत्रालय (MoEF&CC) को सौंपी।

रिपोर्ट में भूगर्भीय, वैज्ञानिक और तकनीकी आधार पर सुझाव दिए गए थे कि
अरावली क्षेत्र को कैसे परिभाषित और संरक्षित किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या निर्णय लिया?

समिति की रिपोर्ट और अन्य विशेषज्ञ मतों पर विचार करने के बाद
नवंबर–दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने एक समान राष्ट्रीय परिभाषा को स्वीकार किया।

सुप्रीम कोर्ट की स्वीकृत परिभाषा:

  • “पहाड़ी (Hill)”
    ऐसा भू-भाग जो आसपास की जमीन से कम से कम 100 मीटर ऊँचा हो
  • “पर्वत श्रृंखला (Range)”
    ऐसी दो या अधिक पहाड़ियाँ, जो आपस में 500 मीटर के दायरे में स्थित हों

इस परिभाषा को अरावली पर्वतमाला पर लागू किया गया।

विवाद क्यों हुआ?

अरावली पर्वत माला पर संकट –

1) “100 मीटर”नियम पर विवाद

अनुमान है कि नई परिभाषा में सिर्फ वही भू-आकृतियाँ शामिल होंगी जिनकी ऊँचाई 100 मीटर या अधिक है।
परन्तु कई पर्यावरण विशेषज्ञ और activist कहते हैं कि इससे लगभग 90% अरावली पर्वत की हिलोक (छोटी पहाड़ियों, रिड्ज़, foothills) बहार गिर जाती है, भले वे groundwater recharge, जैव विविधता और dust control के लिए महत्वपूर्ण हों।

उनका कहना है कि ये छोटे पहाड़ भी ecological balance की “पहली रक्षा पंक्ति” हैं, जो NCR और आसपास के इलाकों में धूल, तूफान और तापमान को नियंत्रित करते हैं।

2) संरक्षण बनाम विकास/खनन

अर्थव्यवस्था से जुड़े समूह, mining lobby, और कुछ स्थानीय communities का कहना है कि अगर सभी ऊँचाई आधार वाले पहाड़ ही काउंट होंगे तो बाकी क्षेत्र mining और निर्माण के लिए खुलेंगे, जिससे पर्यावरण को खतरा हो सकता है.

विरोधी यह भी कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट और सरकार के निर्णय से conservation की intent कमजोर हुई लगती है क्योंकि बड़ी संख्या में भूभाग नये मानदंडों से बाहर हो सकता है।

सामाजिक और राजनीतिक प्रतिक्रिया

✔ NSUI और अन्य संगठनों ने “अरावली बचाओ” रैलियाँ भी आयोजित की है।

✔ नागरिकों समेत environmental groups का कहना है कि फैसला पर्यावरण संरक्षण के बजाय development-friendly दिखता है।

सरकार और केंद्रीय मंत्रियों का पक्ष

केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने विस्तार से बताया है कि:

🔹 100 मीटर परिभाषा का अर्थ भ्रांति नहीं है कि mining हर जगह हो सकती है.
🔹 कुल क्षेत्र का लगभग 90% पहले की तरह संरक्षित रहेगा।
🔹 पर्यावरण संरक्षण को लेकर सख्त निर्देश जारी हैं।
🔹 Mining केवल core/inviolate क्षेत्र में ही विशेष परिस्थितियों में सीमित होगी।

सरकार ने यह भी बताया है कि माइनिंग नियंत्रण, illegal mining रोकना और eco-sensitive area को बचाना कोर्ट की मंज़ूरी के बाद भी प्राथमिकता है।

अब तक की स्थिति

✔ अरावली पर्वत माला पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय लागू है
✔ mining पर temporary moratorium है
✔ पर्यावरण activists और विपक्ष विरोध कर रहे हैं
✔ सरकार defending बयान दे रही है
✔ राजनीति, public protests, silent marches जारी हैं
✔ मामला अब फिरसेreview/appeal के लिए तैयार हो सकता है (review petition की माँग उठी है)

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