उत्क्रांति
एक सतत विकासात्मक प्रवाहित प्रक्रिया। सृष्टि का सत्य और परिवर्तन का कभी न ख़त्म होने वाला निरंतर चक्र ही उत्क्रांति है। उत्क्रांति की इस प्रक्रिया में सार्वभौमिक कानून स्थापित होते हैं और यहां तक कि स्थापित सिद्धांत भी इस प्रक्रिया से नष्ट हो जाते हैं।
उत्क्रांति न केवल जीवन की एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, बल्कि इसमें विश्व की सभी चीजें, पदार्थ आदि भी शामिल हैं। यह प्रक्रिया तदनुसार विकसित होती है, अधिक से अधिक पूर्णता की ओर बढ़ती है। समस्त सृष्टि को इसकी पूर्णता के लिए अविरत कार्य करना पड़ता है। प्रकृति सृजन के साथ-साथ विनाश का चक्र भी अपनाती है। वैश्विक नियम के अनुसार हमारी मानव जाति उसी प्रकृति का एक हिस्सा है। हम मानव जाति की अब तक की विकास यात्रा को जानते हैं। जैविक दृष्टिकोण से, मनुष्य सभी जीवित प्राणियों में सबसे बुद्धिमान के रूप में एक लंबा सफर तय कर चुका है। मानव जाति ने बुद्धि के बल पर विकास के मार्ग में आने वाली सभी चुनौतियों पर विजय प्राप्त करके अपनी स्थिति और अस्तित्व को मजबूत किया है। अपितु, आज मनुष्य प्रकृति के नियमों पर नियंत्रण पाने का प्रयास कर रहा है।
वर्तमान में मानव प्रजाति के संदर्भ में जैविक विकास के बारे में बात करना पर्याप्त नहीं है। क्योंकि मनुष्य होने के नाते हमें विभिन्न दृश्य और अदृश्य भागों के बारे में सोचना पड़ता है। उदाहरण के तौर पर हमें मानव मस्तिष्क, मानव समाज, मानव कला, मानव संस्कृति आदि को ध्यान में रखकर उत्क्रांति के बारे में सोचना होगा। उपरोक्त सभी ने उत्क्रांति में एक लंबा सफर तय किया है। इसमें एक महत्वपूर्ण बात यह है कि जैविक उत्क्रांति प्रकृति के हाथ में है और उपरोक्त चीजों का उत्क्रांति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मनुष्य के हाथ में है। तब हम भी इसमें परिवर्तनशीलता स्थापित करते हुए इस विकासवादी प्रक्रिया में भाग ले सकते हैं। अब एकमात्र प्रश्न यह है कि यदि हम परिवर्तन करने जा रहे हैं, तो क्या वे परिवर्तन मानव जाति के लिए विधायक होंगे या विघातक। अब तक मनुष्य के समक्ष अनेक दार्शनिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक आदि विचार प्रस्तुत किये गये हैं, उन विचारों ने मनुष्य के जीवन में कम अधिक परिवर्तन किये हैं। उनमें से कुछ इंसानों के लिए फायदेमंद थे और कुछ हानिकारक थे। दूसरे शब्दों में, हमसे उत्सर्जित होने वाले विचार, आचरण, व्यवहार, कार्य और समग्र जीवन यात्रा मानव उत्क्रांति को प्रभावित करते हैं। प्रत्येक मनुष्य उत्क्रांति की इस महान प्रक्रिया का एक हिस्सा है। तब हमारा जीवन कोई साधारण प्राकृतिक घटना नहीं बल्कि वास्तव में एक आदर्श मानव समाज बनाने का अवसर है।
हमें याद रखना चाहिए कि उत्क्रांति, क्रांति जैसी लहर पर सवार होकर नहीं आती है। जो सिर्फ वातावरण में मात्र क्षणिक परिवर्तन करके स्वयं को किनारे पर समर्पित कर देगी। उत्क्रांति अनगिनत तरंगों का निर्माण है। अर्थात् उत्क्रांति एक दिन या एक क्षण में संभव नहीं। यह एक सतत प्रक्रिया है I उत्क्रांति में कई कारक एक साथ आते हैं और यहीं से परिवर्तन के नियम स्थापित होते हैं। परिवर्तन धीरे-धीरे आकार लेना शुरू करता है। विश्व में होने वाली प्रत्येक क्रांति कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। इसके पीछे घटनाओं की एक लंबी शृंखला थी I जो एक तरह से विकासवाद को दर्शाता है I फिर एक क्षण में विकास की शृंखला पूरी हो जाती है और मनुष्य द्वारा एक सक्रिय व्यवहार, क्रिया कि जाती है, उसे ही हम क्रांति कहते हैं। क्रांति के पीछे उत्क्रांति का अदृश्य हाथ होता है। इसलिए मानव जीवन में समय-समय पर क्रांति आवश्यक है क्योंकि क्रांति उत्क्रांति की जीवंतता का प्रतीक है। तब मानवी जीवन को पूरक और रचनात्मक करने हेतु वैचारिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक आदि क्रांतियां करते रहेना ही हमारी जिम्मेदारी नहीं बल्कि कर्तव्य बन जाता है।



